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बौद्ध निकायों का इतिहास- History of Buddhist Nikaya

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बौद्ध निकायों का इतिहास- History of Buddhist Nikaya

भगवान् बुद्ध ने बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात् पैंतालीस वर्षों तक सम्पूर्ण मध्यदेश में पैदल चारिका करते हुए उपदेश दिया था। उनके समय में ही बौद्ध धर्म मध्यदेश से बाहर जा चुका था । प्रायः उत्तर भारत के सभी जनपदों में उनके प्रति जनसाधारण में प्रगाढ़ श्रद्धा थी । उनके विहारों के निर्माण हो चुके थे और सहस्रों भिक्षु उनके अनुयायी थे। कोसल नरेश प्रसेनजित्, मगध नरेश बिम्बिसार और अजातशत्रु अवन्ति - नरेश चण्डप्रद्योत, वत्सनरेश उदयन आदि बौद्धधर्म के शुभेच्छु थे। भगवान् बुद्ध के जीवनकाल में केवल एक बार ही कौशाम्बी में भिक्षुओं में एक साधारण बात को लेकर पारस्परिक मतभेद उत्पन्न हो गया था, जो तीन मास के उपरान्त हो शान्त हो गया था, फिर भगवान् बुद्ध के महापरिनिर्वाण के समय तक भिक्षुसंघ में किसी प्रकार का मतभेद उत्पन्न नहीं हुआ। सभी भिक्षु दूध-पानी के समान मिल-जुल कर परस्पर सौहार्द और मैत्री से अपने लक्ष्य की प्राप्ति में जुटे रहते थे। किन्तु भगवान् बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात् ही भिक्षुसंघ में मतभेद दृष्टिगोचर होने लगा। उसकी रोकथाम के लिए प्रथम संगीति का आयोजन हुआ, फिर उसके सौ वर्षों के पश्चात् द्वितीय संगीति हुई तत्पश्चात् बुद्ध-महापरिनिर्वाण के 218 वर्षों के बाद तृतीय संगीति । स्थविरवाद की चौथी संगीति बट्टगामणी अभय के समय (ईस्वी पूर्व 27- 1 ईस्वी सन् ) में श्रीलंका में सम्पादित हुई और भारत में चौथी संगीति काश्मीर के कुण्डलवन विहार में कनिष्क के समय ( ईस्वी सन् 78-100) में हुई थी। इन संगीतियों में भिक्षुसंघ द्वारा किये गए प्रयत्नों तथा राजाओं से प्राप्त संरक्षणों से भी भिक्षुसंघ एकाबद्ध नहीं रह सका । उनमें मतभेद बढ़ता ही गया और अनेक निकायों का प्रादुर्भाव होता गया । सम्राट् अशोक के समय तक इन निकायों की संख्या अट्ठारह तक पहुँच चुकी थी। पीछे इनमें और भी वृद्धि हो गयी । सम्राट् अशोक के आचार्य भदन्त मोग्गलिपुत्ततिस्स ने अपने कथावत्थुप्पकरण के उपदेश द्वारा स्थविरवाद के सिद्धान्तों का निराकरण किया, किन्तु महायानी के निकाय उससे आबद्ध नहीं थे। इस प्रकार स्थविरवाद और महायान दोनों ही परम्पराओं में निकायों की बढ़ोत्तरी होती गयी और यह क्रम आगे भी चलता रहा।

भगवान् बुद्ध ने बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात् पैंतालीस वर्षों तक सम्पूर्ण मध्यदेश में पैदल चारिका करते हुए उपदेश दिया था। उनके समय में ही बौद्ध धर्म मध्यदेश से बाहर जा चुका था । प्रायः उत्तर भारत के सभी जनपदों में उनके प्रति जनसाधारण में प्रगाढ़ श्रद्धा थी । उनके विहारों के निर्माण हो चुके थे और सहस्रों भिक्षु उनके अनुयायी थे। कोसल नरेश प्रसेनजित्, मगध नरेश बिम्बिसार और अजातशत्रु अवन्ति - नरेश चण्डप्रद्योत, वत्सनरेश उदयन आदि बौद्धधर्म के शुभेच्छु थे। भगवान् बुद्ध के जीवनकाल में केवल एक बार ही कौशाम्बी में भिक्षुओं में एक साधारण बात को लेकर पारस्परिक मतभेद उत्पन्न हो गया था, जो तीन मास के उपरान्त हो शान्त हो गया था, फिर भगवान् बुद्ध के महापरिनिर्वाण के समय तक भिक्षुसंघ में किसी प्रकार का मतभेद उत्पन्न नहीं हुआ। सभी भिक्षु दूध-पानी के समान मिल-जुल कर परस्पर सौहार्द और मैत्री से अपने लक्ष्य की प्राप्ति में जुटे रहते थे। किन्तु भगवान् बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात् ही भिक्षुसंघ में मतभेद दृष्टिगोचर होने लगा। उसकी रोकथाम के लिए प्रथम संगीति का आयोजन हुआ, फिर उसके सौ वर्षों के पश्चात् द्वितीय संगीति हुई तत्पश्चात् बुद्ध-महापरिनिर्वाण के 218 वर्षों के बाद तृतीय संगीति । स्थविरवाद की चौथी संगीति बट्टगामणी अभय के समय (ईस्वी पूर्व 27- 1 ईस्वी सन् ) में श्रीलंका में सम्पादित हुई और भारत में चौथी संगीति काश्मीर के कुण्डलवन विहार में कनिष्क के समय ( ईस्वी सन् 78-100) में हुई थी। इन संगीतियों में भिक्षुसंघ द्वारा किये गए प्रयत्नों तथा राजाओं से प्राप्त संरक्षणों से भी भिक्षुसंघ एकाबद्ध नहीं रह सका । उनमें मतभेद बढ़ता ही गया और अनेक निकायों का प्रादुर्भाव होता गया । सम्राट् अशोक के समय तक इन निकायों की संख्या अट्ठारह तक पहुँच चुकी थी। पीछे इनमें और भी वृद्धि हो गयी । सम्राट् अशोक के आचार्य भदन्त मोग्गलिपुत्ततिस्स ने अपने कथावत्थुप्पकरण के उपदेश द्वारा स्थविरवाद के सिद्धान्तों का निराकरण किया, किन्तु महायानी के निकाय उससे आबद्ध नहीं थे। इस प्रकार स्थविरवाद और महायान दोनों ही परम्पराओं में निकायों की बढ़ोत्तरी होती गयी और यह क्रम आगे भी चलता रहा।

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भगवान् बुद्ध ने बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात् पैंतालीस वर्षों तक सम्पूर्ण मध्यदेश में पैदल चारिका करते हुए उपदेश दिया था। उनके समय में ही बौद्ध धर्म मध्यदेश से बाहर जा चुका था । प्रायः उत्तर भारत के सभी जनपदों में उनके प्रति जनसाधारण में प्रगाढ़ श्रद्धा थी । उनके विहारों के निर्माण हो चुके थे और सहस्रों भिक्षु उनके अनुयायी थे। कोसल नरेश प्रसेनजित्, मगध नरेश बिम्बिसार और अजातशत्रु अवन्ति - नरेश चण्डप्रद्योत, वत्सनरेश उदयन आदि बौद्धधर्म के शुभेच्छु थे। भगवान् बुद्ध के जीवनकाल में केवल एक बार ही कौशाम्बी में भिक्षुओं में एक साधारण बात को लेकर पारस्परिक मतभेद उत्पन्न हो गया था, जो तीन मास के उपरान्त हो शान्त हो गया था, फिर भगवान् बुद्ध के महापरिनिर्वाण के समय तक भिक्षुसंघ में किसी प्रकार का मतभेद उत्पन्न नहीं हुआ। सभी भिक्षु दूध-पानी के समान मिल-जुल कर परस्पर सौहार्द और मैत्री से अपने लक्ष्य की प्राप्ति में जुटे रहते थे। किन्तु भगवान् बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात् ही भिक्षुसंघ में मतभेद दृष्टिगोचर होने लगा। उसकी रोकथाम के लिए प्रथम संगीति का आयोजन हुआ, फिर उसके सौ वर्षों के पश्चात् द्वितीय संगीति हुई तत्पश्चात् बुद्ध-महापरिनिर्वाण के 218 वर्षों के बाद तृतीय संगीति । स्थविरवाद की चौथी संगीति बट्टगामणी अभय के समय (ईस्वी पूर्व 27- 1 ईस्वी सन् ) में श्रीलंका में सम्पादित हुई और भारत में चौथी संगीति काश्मीर के कुण्डलवन विहार में कनिष्क के समय ( ईस्वी सन् 78-100) में हुई थी। इन संगीतियों में भिक्षुसंघ द्वारा किये गए प्रयत्नों तथा राजाओं से प्राप्त संरक्षणों से भी भिक्षुसंघ एकाबद्ध नहीं रह सका । उनमें मतभेद बढ़ता ही गया और अनेक निकायों का प्रादुर्भाव होता गया । सम्राट् अशोक के समय तक इन निकायों की संख्या अट्ठारह तक पहुँच चुकी थी। पीछे इनमें और भी वृद्धि हो गयी । सम्राट् अशोक के आचार्य भदन्त मोग्गलिपुत्ततिस्स ने अपने कथावत्थुप्पकरण के उपदेश द्वारा स्थविरवाद के सिद्धान्तों का निराकरण किया, किन्तु महायानी के निकाय उससे आबद्ध नहीं थे। इस प्रकार स्थविरवाद और महायान दोनों ही परम्पराओं में निकायों की बढ़ोत्तरी होती गयी और यह क्रम आगे भी चलता रहा।