
कात्यायनशुल्बसूत्रम्: सोपपत्तिकं पर्यालोचनम्- Katyayana Shulba Sutram: Sopapatikam Parayalochanam by Dr. Rameshchandra Dash Sharma
वैदिक वाङ्मय में शुल्व सूत्रों का स्थान अति महत्वपूर्ण है। श्रोत यज्ञों में कुण्डमण्डप तथा इष्टकाओं का निर्माण इसी शास्त्र से होता है। "सर्ववेदे प्रतिष्ठितम्" वचन के अनुसार श्रुतिमूलक यह ग्रन्थ रेखा गणित (जमेट्री) शास्त्र का जनक है ।
क्षेत्र द्वैगुण्य का मानदण्ड, समचतुष्कोण को आयताकार में परिवर्तित करना, आयत को सम-चतुरस्र में । भुजकोटि के समिष्ट क्षेत्र फल प्रतिपादक प्रमाण का निर्धारण, त्रिकोण को चतुष्कोण में, चतुष्कोण को त्रिकोण में, वृत्त को चतुरस्र एवं चतुरस्र को वृत्त में परिवर्तित करना इत्यादि शुल्व प्रमेय इस शास्त्र में वर्णित है ।
वैदिक वाङ्मय में शुल्व सूत्रों का स्थान अति महत्वपूर्ण है। श्रोत यज्ञों में कुण्डमण्डप तथा इष्टकाओं का निर्माण इसी शास्त्र से होता है। "सर्ववेदे प्रतिष्ठितम्" वचन के अनुसार श्रुतिमूलक यह ग्रन्थ रेखा गणित (जमेट्री) शास्त्र का जनक है ।
क्षेत्र द्वैगुण्य का मानदण्ड, समचतुष्कोण को आयताकार में परिवर्तित करना, आयत को सम-चतुरस्र में । भुजकोटि के समिष्ट क्षेत्र फल प्रतिपादक प्रमाण का निर्धारण, त्रिकोण को चतुष्कोण में, चतुष्कोण को त्रिकोण में, वृत्त को चतुरस्र एवं चतुरस्र को वृत्त में परिवर्तित करना इत्यादि शुल्व प्रमेय इस शास्त्र में वर्णित है ।
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वैदिक वाङ्मय में शुल्व सूत्रों का स्थान अति महत्वपूर्ण है। श्रोत यज्ञों में कुण्डमण्डप तथा इष्टकाओं का निर्माण इसी शास्त्र से होता है। "सर्ववेदे प्रतिष्ठितम्" वचन के अनुसार श्रुतिमूलक यह ग्रन्थ रेखा गणित (जमेट्री) शास्त्र का जनक है ।
क्षेत्र द्वैगुण्य का मानदण्ड, समचतुष्कोण को आयताकार में परिवर्तित करना, आयत को सम-चतुरस्र में । भुजकोटि के समिष्ट क्षेत्र फल प्रतिपादक प्रमाण का निर्धारण, त्रिकोण को चतुष्कोण में, चतुष्कोण को त्रिकोण में, वृत्त को चतुरस्र एवं चतुरस्र को वृत्त में परिवर्तित करना इत्यादि शुल्व प्रमेय इस शास्त्र में वर्णित है ।

















