
काव्यादर्श पर 'रत्नश्री' टीका (एक समीक्षण) -Kavyadarsh Par Ratnashri Teeka by Dr. Krishnanand Pandey
आचार्य दण्डी विरचित काव्यादर्श का स्थान संस्कृत काव्यशास्त्र की परम्परा में सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वविदित है। फलतः कालान्तर में इस पर अनेक टीकाओं का प्रणयन किया गया है, जिनमें प्रमुख है लंकानिवासी बौद्ध भिक्षु 'रत्नश्रीज्ञान' द्वारा प्रणीत 'रत्नश्री' टीका। प्रस्तुत ग्रन्थ काव्यशास्त्र की अप्रतिम श्रृंखला के अमूल्य रत्न काव्यादर्श पर विरचित रत्नश्री टीका के विविध अवयवों पर विवेचन प्रस्तुत करता है।
आचार्य दण्डी विरचित काव्यादर्श का स्थान संस्कृत काव्यशास्त्र की परम्परा में सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वविदित है। फलतः कालान्तर में इस पर अनेक टीकाओं का प्रणयन किया गया है, जिनमें प्रमुख है लंकानिवासी बौद्ध भिक्षु 'रत्नश्रीज्ञान' द्वारा प्रणीत 'रत्नश्री' टीका। प्रस्तुत ग्रन्थ काव्यशास्त्र की अप्रतिम श्रृंखला के अमूल्य रत्न काव्यादर्श पर विरचित रत्नश्री टीका के विविध अवयवों पर विवेचन प्रस्तुत करता है।
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आचार्य दण्डी विरचित काव्यादर्श का स्थान संस्कृत काव्यशास्त्र की परम्परा में सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वविदित है। फलतः कालान्तर में इस पर अनेक टीकाओं का प्रणयन किया गया है, जिनमें प्रमुख है लंकानिवासी बौद्ध भिक्षु 'रत्नश्रीज्ञान' द्वारा प्रणीत 'रत्नश्री' टीका। प्रस्तुत ग्रन्थ काव्यशास्त्र की अप्रतिम श्रृंखला के अमूल्य रत्न काव्यादर्श पर विरचित रत्नश्री टीका के विविध अवयवों पर विवेचन प्रस्तुत करता है।














