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मन्त्रमहोदधि - Mantra Mahodadhi

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मन्त्रमहोदधि - Mantra Mahodadhi

"मंत्र महोदधि" मंत्र शास्त्र का महत्त्वपूर्ण संग्रह ग्रंथ है। इसके संग्रहकर्त्ता महीधरभट्ट थे। इनके पिता फनू भट्ट थे, जो कि भगवान् राम के परम भक्त थे। महीधर वत्सगोत्रीय अहिच्छत्र ब्राह्मण थे। ये मूलतः अहिच्छत्र के निवासी थे। संसार को असार समझकर महीधर वाराणसी चले आये। कुछ विद्वानों और अपने पुत्र कल्याण के कहने पर भगवान् विश्वनाथ के समक्ष रहकर 1645 विक्रम संवत में मंत्र महोदधि नामक इस ग्रंथ की रचना की।

महीधर लक्ष्मीनृसिंह के उपासक थे। महीधर ने ग्रन्थ के आरम्भव अन्त दोनों ही स्थानों पर इनकी वन्दना की है। ग्रन्थ के आरम्भ में महीधर ने अपने गुरु श्रीनृसिंहाश्रम की भी वन्दना की है।

मंत्र महोदधि मंत्र शास्त्र का लोकप्रिय ग्रन्थ है। इसकी सहस्रो पाण्डुलिपियाँ राष्ट्र के अनेक पुस्तकालयों में सुरक्षित रखी है। महामाहोपाध्याय पण्डित गोपीनाथ कविराज जी ने अपने ग्रंथ 'तन्त्रिक साहित्य' के पृष्ठ 468-470 में मन्त्रमहोदधि का विवरण इस प्रकार दिया है-

(1) इण्डिया ऑफिस, पुस्तकालय लन्दन का सूची पत्र क्रमांक 2576- राजा लक्ष्मीनृसिंह की संरक्षकता में संवत् 1645 में इसका निर्माण हुआ था। इसके निर्माता रत्नाकर के पौत्र रामभक्त फनू भट्ट के पुत्र महीधर हैं। यह 25 तरङ्गों में पूर्ण तान्त्रिक पूजा का विवरणात्मक ग्रन्थ है। इस पर ग्रन्थकार की ही स्वरचित नौका टीका है।

(2) बीकानेर पुस्तकालय का सूची पत्र क्रमांक 1292-इसमें विविध मंत्र और यन्त्र, जो देवी-देवताओं की पूजा में व्यवहृत होते हैं, वर्णित हैं।

"मंत्र महोदधि" मंत्र शास्त्र का महत्त्वपूर्ण संग्रह ग्रंथ है। इसके संग्रहकर्त्ता महीधरभट्ट थे। इनके पिता फनू भट्ट थे, जो कि भगवान् राम के परम भक्त थे। महीधर वत्सगोत्रीय अहिच्छत्र ब्राह्मण थे। ये मूलतः अहिच्छत्र के निवासी थे। संसार को असार समझकर महीधर वाराणसी चले आये। कुछ विद्वानों और अपने पुत्र कल्याण के कहने पर भगवान् विश्वनाथ के समक्ष रहकर 1645 विक्रम संवत में मंत्र महोदधि नामक इस ग्रंथ की रचना की।

महीधर लक्ष्मीनृसिंह के उपासक थे। महीधर ने ग्रन्थ के आरम्भव अन्त दोनों ही स्थानों पर इनकी वन्दना की है। ग्रन्थ के आरम्भ में महीधर ने अपने गुरु श्रीनृसिंहाश्रम की भी वन्दना की है।

मंत्र महोदधि मंत्र शास्त्र का लोकप्रिय ग्रन्थ है। इसकी सहस्रो पाण्डुलिपियाँ राष्ट्र के अनेक पुस्तकालयों में सुरक्षित रखी है। महामाहोपाध्याय पण्डित गोपीनाथ कविराज जी ने अपने ग्रंथ 'तन्त्रिक साहित्य' के पृष्ठ 468-470 में मन्त्रमहोदधि का विवरण इस प्रकार दिया है-

(1) इण्डिया ऑफिस, पुस्तकालय लन्दन का सूची पत्र क्रमांक 2576- राजा लक्ष्मीनृसिंह की संरक्षकता में संवत् 1645 में इसका निर्माण हुआ था। इसके निर्माता रत्नाकर के पौत्र रामभक्त फनू भट्ट के पुत्र महीधर हैं। यह 25 तरङ्गों में पूर्ण तान्त्रिक पूजा का विवरणात्मक ग्रन्थ है। इस पर ग्रन्थकार की ही स्वरचित नौका टीका है।

(2) बीकानेर पुस्तकालय का सूची पत्र क्रमांक 1292-इसमें विविध मंत्र और यन्त्र, जो देवी-देवताओं की पूजा में व्यवहृत होते हैं, वर्णित हैं।

$13.29
मन्त्रमहोदधि - Mantra Mahodadhi
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Description

"मंत्र महोदधि" मंत्र शास्त्र का महत्त्वपूर्ण संग्रह ग्रंथ है। इसके संग्रहकर्त्ता महीधरभट्ट थे। इनके पिता फनू भट्ट थे, जो कि भगवान् राम के परम भक्त थे। महीधर वत्सगोत्रीय अहिच्छत्र ब्राह्मण थे। ये मूलतः अहिच्छत्र के निवासी थे। संसार को असार समझकर महीधर वाराणसी चले आये। कुछ विद्वानों और अपने पुत्र कल्याण के कहने पर भगवान् विश्वनाथ के समक्ष रहकर 1645 विक्रम संवत में मंत्र महोदधि नामक इस ग्रंथ की रचना की।

महीधर लक्ष्मीनृसिंह के उपासक थे। महीधर ने ग्रन्थ के आरम्भव अन्त दोनों ही स्थानों पर इनकी वन्दना की है। ग्रन्थ के आरम्भ में महीधर ने अपने गुरु श्रीनृसिंहाश्रम की भी वन्दना की है।

मंत्र महोदधि मंत्र शास्त्र का लोकप्रिय ग्रन्थ है। इसकी सहस्रो पाण्डुलिपियाँ राष्ट्र के अनेक पुस्तकालयों में सुरक्षित रखी है। महामाहोपाध्याय पण्डित गोपीनाथ कविराज जी ने अपने ग्रंथ 'तन्त्रिक साहित्य' के पृष्ठ 468-470 में मन्त्रमहोदधि का विवरण इस प्रकार दिया है-

(1) इण्डिया ऑफिस, पुस्तकालय लन्दन का सूची पत्र क्रमांक 2576- राजा लक्ष्मीनृसिंह की संरक्षकता में संवत् 1645 में इसका निर्माण हुआ था। इसके निर्माता रत्नाकर के पौत्र रामभक्त फनू भट्ट के पुत्र महीधर हैं। यह 25 तरङ्गों में पूर्ण तान्त्रिक पूजा का विवरणात्मक ग्रन्थ है। इस पर ग्रन्थकार की ही स्वरचित नौका टीका है।

(2) बीकानेर पुस्तकालय का सूची पत्र क्रमांक 1292-इसमें विविध मंत्र और यन्त्र, जो देवी-देवताओं की पूजा में व्यवहृत होते हैं, वर्णित हैं।