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Muhurtachintamani of Daivagya Ramacharya

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Muhurtachintamani of Daivagya Ramacharya

वराहमिहिर-कृत गृहज्जातक फलित ज्योतिष का उपजीव्य ग्रन्थ है। इसमें 28 प्रकरण हैं-राशिप्रभेद, ग्रहयोनि, वियोनिजन्म, निषेक, जन्मविधि, अरिष्ट, आयुर्याय, दशान्तदेशश, अष्टकवर्ग, कर्माजीव, राजयोग, नाभस योग, चन्द्रयोग, द्विग्रहयोग, प्रत्रज्यायोग, आऋक्षशीलयोग, चन्द्रराशिशील, राशिशील, दृष्टिफल, भाव, आश्रययोग, प्रकीर्ण, अनिष्टयोग, स्त्रीजातक, नैर्याणिक, नष्टजातक द्रेष्काण एवं उपसंहार। ग्रंथ की समाप्ति पर ग्रन्थरचयिता आचार्य की वंशपरम्परा का संक्षिप्त वर्णन है। प्रस्तुत प्रकाशन में मूल ग्रन्थ एवं उसकी भुट्टोत्पल-कृत संस्कृत टीका के साथ पं. केदारदत्त जोशी की हिन्दी व्याख्या भी समाविष्ट है।

इस ग्रन्थ के 16 अध्याय है ग्रह माध्यम साधन के मध्यमाधिकार, सूर्यचन्द्र स्पष्टीकरणा-धिकार, मंगल बुध बृहस्पति शुक्र शनि से पश्चतारास्पष्टीकरणाधिकार, भूमण्डल में दिशा-देश और समय ज्ञान का त्रिप्रश्नाधिकार, चन्द्रसूर्यग्रहणाधिकार, मासगणनाधिकार, ग्रहणद्वय-साधनाधिकार, उदयास्ताधिकार, ग्रहच्छायाधिकार, नक्षत्रच्छायाधिकार, श्रृंगीन्नत्ति, ग्रहयुति, पात, तिथिवार, नक्षत्रयोगकरणाधिकार, उपसंहार। लघु आंकड़ों से ग्रह साधन की जो चमत्कारिक गवेषणा की गई है, वह शुद्ध और सूक्ष्म है। मूल एवं दो प्राचीन टीकाओं के साथ पं० केदारदत्त जोशी की हिन्दी व्याख्या ने विषय को भलीभाँति स्मष्ट एवं सुग्राह्य बना दिया है।

वराहमिहिर-कृत गृहज्जातक फलित ज्योतिष का उपजीव्य ग्रन्थ है। इसमें 28 प्रकरण हैं-राशिप्रभेद, ग्रहयोनि, वियोनिजन्म, निषेक, जन्मविधि, अरिष्ट, आयुर्याय, दशान्तदेशश, अष्टकवर्ग, कर्माजीव, राजयोग, नाभस योग, चन्द्रयोग, द्विग्रहयोग, प्रत्रज्यायोग, आऋक्षशीलयोग, चन्द्रराशिशील, राशिशील, दृष्टिफल, भाव, आश्रययोग, प्रकीर्ण, अनिष्टयोग, स्त्रीजातक, नैर्याणिक, नष्टजातक द्रेष्काण एवं उपसंहार। ग्रंथ की समाप्ति पर ग्रन्थरचयिता आचार्य की वंशपरम्परा का संक्षिप्त वर्णन है। प्रस्तुत प्रकाशन में मूल ग्रन्थ एवं उसकी भुट्टोत्पल-कृत संस्कृत टीका के साथ पं. केदारदत्त जोशी की हिन्दी व्याख्या भी समाविष्ट है।

इस ग्रन्थ के 16 अध्याय है ग्रह माध्यम साधन के मध्यमाधिकार, सूर्यचन्द्र स्पष्टीकरणा-धिकार, मंगल बुध बृहस्पति शुक्र शनि से पश्चतारास्पष्टीकरणाधिकार, भूमण्डल में दिशा-देश और समय ज्ञान का त्रिप्रश्नाधिकार, चन्द्रसूर्यग्रहणाधिकार, मासगणनाधिकार, ग्रहणद्वय-साधनाधिकार, उदयास्ताधिकार, ग्रहच्छायाधिकार, नक्षत्रच्छायाधिकार, श्रृंगीन्नत्ति, ग्रहयुति, पात, तिथिवार, नक्षत्रयोगकरणाधिकार, उपसंहार। लघु आंकड़ों से ग्रह साधन की जो चमत्कारिक गवेषणा की गई है, वह शुद्ध और सूक्ष्म है। मूल एवं दो प्राचीन टीकाओं के साथ पं० केदारदत्त जोशी की हिन्दी व्याख्या ने विषय को भलीभाँति स्मष्ट एवं सुग्राह्य बना दिया है।

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Muhurtachintamani of Daivagya Ramacharya
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Description

वराहमिहिर-कृत गृहज्जातक फलित ज्योतिष का उपजीव्य ग्रन्थ है। इसमें 28 प्रकरण हैं-राशिप्रभेद, ग्रहयोनि, वियोनिजन्म, निषेक, जन्मविधि, अरिष्ट, आयुर्याय, दशान्तदेशश, अष्टकवर्ग, कर्माजीव, राजयोग, नाभस योग, चन्द्रयोग, द्विग्रहयोग, प्रत्रज्यायोग, आऋक्षशीलयोग, चन्द्रराशिशील, राशिशील, दृष्टिफल, भाव, आश्रययोग, प्रकीर्ण, अनिष्टयोग, स्त्रीजातक, नैर्याणिक, नष्टजातक द्रेष्काण एवं उपसंहार। ग्रंथ की समाप्ति पर ग्रन्थरचयिता आचार्य की वंशपरम्परा का संक्षिप्त वर्णन है। प्रस्तुत प्रकाशन में मूल ग्रन्थ एवं उसकी भुट्टोत्पल-कृत संस्कृत टीका के साथ पं. केदारदत्त जोशी की हिन्दी व्याख्या भी समाविष्ट है।

इस ग्रन्थ के 16 अध्याय है ग्रह माध्यम साधन के मध्यमाधिकार, सूर्यचन्द्र स्पष्टीकरणा-धिकार, मंगल बुध बृहस्पति शुक्र शनि से पश्चतारास्पष्टीकरणाधिकार, भूमण्डल में दिशा-देश और समय ज्ञान का त्रिप्रश्नाधिकार, चन्द्रसूर्यग्रहणाधिकार, मासगणनाधिकार, ग्रहणद्वय-साधनाधिकार, उदयास्ताधिकार, ग्रहच्छायाधिकार, नक्षत्रच्छायाधिकार, श्रृंगीन्नत्ति, ग्रहयुति, पात, तिथिवार, नक्षत्रयोगकरणाधिकार, उपसंहार। लघु आंकड़ों से ग्रह साधन की जो चमत्कारिक गवेषणा की गई है, वह शुद्ध और सूक्ष्म है। मूल एवं दो प्राचीन टीकाओं के साथ पं० केदारदत्त जोशी की हिन्दी व्याख्या ने विषय को भलीभाँति स्मष्ट एवं सुग्राह्य बना दिया है।