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नवपद पूजे शिवपद पावे-Navpad Pooje Shivapad Pave (1999)

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नवपद पूजे शिवपद पावे-Navpad Pooje Shivapad Pave (1999)

प्रस्तावना

भगवान महावीर ने मोक्ष प्राप्ति के चार हेतु बतलाये हैं-ज्ञान, दर्शन, चारित्र तथा तप। ज्ञान से सत्य के प्रति श्रद्धा होती है, ज्ञान से चारित्राराधना की प्रक्रिया का बोध होता है, ज्ञान से तप में सुस्थिरता आती है। जैनागम कहता है-"पढमं नाणं तओ दया" ज्ञान का स्थान प्रथम है, दया आदि क्रियाएँ उसकी अनुवर्तिनी हैं। ज्ञान अज्ञानान्धकार को हटाने वाला है। उसके प्रकाश में पथ का अवबोध होता है।

ज्ञानोपलब्धि का एक साधन है साहित्य। "साहित्य" शब्द की गहराई में जायें तो उसका व्युत्पत्तिपरक अर्थ निकलता है-हितेन सहितम् सहितम् । सहितस्य भावः साहित्यम्। जो हितकारक हो, जीवनोपयोगी हो, वह साहित्य है। इस दृष्टि से सत्साहित्य ही वस्तुतः साहित्य कहा जा सकता है।

प्रचार के क्षेत्र में "प्रवचन साहित्य" का महत्त्वपूर्ण स्थान है। सन्त-महात्मा जनहितार्थ प्रवचन करते हैं, अपनी साधना का नवनीत उदारतापूर्वक बाँटते हैं; उस वाणी का संकलन सभी के लिए उपयोगी हो जाता है। प्रवचन सुनने वालों की अपेक्षा इन संग्रहों से पाठक कहीं अधिक संख्या में लाभान्वित हो सकते हैं। क्योंकि इन निबन्धाकार विचारों को पढ़ने, इन पर चिन्तन-मनन करने का पूरा अवकाश रहता है।

प्रवचन संग्रहों की श्रृंखला में आचार्य श्री विजय नित्यानन्द सूरि जी के प्रवचनों का संकलन "नवपद पूजेः शिवपद पावे" एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। प्रथम दृष्ट्या पुस्तक का अवलोकन करने से ही ऐसी प्रतीति होती है कि व्याख्याता गंभीर अध्ययनशील एवं विवेच्य विषय के विशेषज्ञ हैं। सूरीश्वर जी ने व्याख्येय विषय की अतल गहराई को छुआ है तथा साथ ही पारिपार्श्विक परिस्थितियों की भी उपेक्षा नहीं की है। विषय के सभी संभावित पहलुओं को छूने व विभिन्न दृष्टियों से उनको व्याख्यायित करने का सफल प्रयास प्रस्तुत संकलन में हुआ है।

आर्हत् दर्शन से सम्बन्धित विषयों के प्रस्तुतीकरण में व्याख्याता ने वैदिक, पौराणिक उद्धरण, सूक्त व श्लोक देकर अपने प्रतिपाद्य को सर्वाङ्गीण बना दिया

प्रस्तावना

भगवान महावीर ने मोक्ष प्राप्ति के चार हेतु बतलाये हैं-ज्ञान, दर्शन, चारित्र तथा तप। ज्ञान से सत्य के प्रति श्रद्धा होती है, ज्ञान से चारित्राराधना की प्रक्रिया का बोध होता है, ज्ञान से तप में सुस्थिरता आती है। जैनागम कहता है-"पढमं नाणं तओ दया" ज्ञान का स्थान प्रथम है, दया आदि क्रियाएँ उसकी अनुवर्तिनी हैं। ज्ञान अज्ञानान्धकार को हटाने वाला है। उसके प्रकाश में पथ का अवबोध होता है।

ज्ञानोपलब्धि का एक साधन है साहित्य। "साहित्य" शब्द की गहराई में जायें तो उसका व्युत्पत्तिपरक अर्थ निकलता है-हितेन सहितम् सहितम् । सहितस्य भावः साहित्यम्। जो हितकारक हो, जीवनोपयोगी हो, वह साहित्य है। इस दृष्टि से सत्साहित्य ही वस्तुतः साहित्य कहा जा सकता है।

प्रचार के क्षेत्र में "प्रवचन साहित्य" का महत्त्वपूर्ण स्थान है। सन्त-महात्मा जनहितार्थ प्रवचन करते हैं, अपनी साधना का नवनीत उदारतापूर्वक बाँटते हैं; उस वाणी का संकलन सभी के लिए उपयोगी हो जाता है। प्रवचन सुनने वालों की अपेक्षा इन संग्रहों से पाठक कहीं अधिक संख्या में लाभान्वित हो सकते हैं। क्योंकि इन निबन्धाकार विचारों को पढ़ने, इन पर चिन्तन-मनन करने का पूरा अवकाश रहता है।

प्रवचन संग्रहों की श्रृंखला में आचार्य श्री विजय नित्यानन्द सूरि जी के प्रवचनों का संकलन "नवपद पूजेः शिवपद पावे" एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। प्रथम दृष्ट्या पुस्तक का अवलोकन करने से ही ऐसी प्रतीति होती है कि व्याख्याता गंभीर अध्ययनशील एवं विवेच्य विषय के विशेषज्ञ हैं। सूरीश्वर जी ने व्याख्येय विषय की अतल गहराई को छुआ है तथा साथ ही पारिपार्श्विक परिस्थितियों की भी उपेक्षा नहीं की है। विषय के सभी संभावित पहलुओं को छूने व विभिन्न दृष्टियों से उनको व्याख्यायित करने का सफल प्रयास प्रस्तुत संकलन में हुआ है।

आर्हत् दर्शन से सम्बन्धित विषयों के प्रस्तुतीकरण में व्याख्याता ने वैदिक, पौराणिक उद्धरण, सूक्त व श्लोक देकर अपने प्रतिपाद्य को सर्वाङ्गीण बना दिया

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नवपद पूजे शिवपद पावे-Navpad Pooje Shivapad Pave (1999)

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भगवान महावीर ने मोक्ष प्राप्ति के चार हेतु बतलाये हैं-ज्ञान, दर्शन, चारित्र तथा तप। ज्ञान से सत्य के प्रति श्रद्धा होती है, ज्ञान से चारित्राराधना की प्रक्रिया का बोध होता है, ज्ञान से तप में सुस्थिरता आती है। जैनागम कहता है-"पढमं नाणं तओ दया" ज्ञान का स्थान प्रथम है, दया आदि क्रियाएँ उसकी अनुवर्तिनी हैं। ज्ञान अज्ञानान्धकार को हटाने वाला है। उसके प्रकाश में पथ का अवबोध होता है।

ज्ञानोपलब्धि का एक साधन है साहित्य। "साहित्य" शब्द की गहराई में जायें तो उसका व्युत्पत्तिपरक अर्थ निकलता है-हितेन सहितम् सहितम् । सहितस्य भावः साहित्यम्। जो हितकारक हो, जीवनोपयोगी हो, वह साहित्य है। इस दृष्टि से सत्साहित्य ही वस्तुतः साहित्य कहा जा सकता है।

प्रचार के क्षेत्र में "प्रवचन साहित्य" का महत्त्वपूर्ण स्थान है। सन्त-महात्मा जनहितार्थ प्रवचन करते हैं, अपनी साधना का नवनीत उदारतापूर्वक बाँटते हैं; उस वाणी का संकलन सभी के लिए उपयोगी हो जाता है। प्रवचन सुनने वालों की अपेक्षा इन संग्रहों से पाठक कहीं अधिक संख्या में लाभान्वित हो सकते हैं। क्योंकि इन निबन्धाकार विचारों को पढ़ने, इन पर चिन्तन-मनन करने का पूरा अवकाश रहता है।

प्रवचन संग्रहों की श्रृंखला में आचार्य श्री विजय नित्यानन्द सूरि जी के प्रवचनों का संकलन "नवपद पूजेः शिवपद पावे" एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। प्रथम दृष्ट्या पुस्तक का अवलोकन करने से ही ऐसी प्रतीति होती है कि व्याख्याता गंभीर अध्ययनशील एवं विवेच्य विषय के विशेषज्ञ हैं। सूरीश्वर जी ने व्याख्येय विषय की अतल गहराई को छुआ है तथा साथ ही पारिपार्श्विक परिस्थितियों की भी उपेक्षा नहीं की है। विषय के सभी संभावित पहलुओं को छूने व विभिन्न दृष्टियों से उनको व्याख्यायित करने का सफल प्रयास प्रस्तुत संकलन में हुआ है।

आर्हत् दर्शन से सम्बन्धित विषयों के प्रस्तुतीकरण में व्याख्याता ने वैदिक, पौराणिक उद्धरण, सूक्त व श्लोक देकर अपने प्रतिपाद्य को सर्वाङ्गीण बना दिया