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Revelation (1991 Edition)

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Revelation (1991 Edition)

Revelation – Sri Ramana Hridayam" एक विशेष और गहन ग्रंथ है जो श्री रामण महर्षि के जीवन, उनके अनुभवों और उनके अद्वितीय आत्म-ज्ञान की शिक्षाओं को प्रस्तुत करता है। यह ग्रंथ श्री मुरुगनार द्वारा लिखा गया था और इसमें श्री रामण महर्षि के दर्शन, उनके विचार, और उनके आध्यात्मिक मार्गदर्शन को संकलित किया गया है। "Sri Ramana Hridayam" का शाब्दिक अर्थ है "श्री रामण के हृदय का ग्रंथ", जिसका मतलब है कि यह ग्रंथ श्री रामण महर्षि के हृदय में गहरे तौर पर बसा हुआ सच्चा ज्ञान और अनुभव है।

"Revelation – Sri Ramana Hridayam" के प्रमुख बिंदु:

  1. आत्म-निर्णय (Self-Enquiry):

    • श्री रामण महर्षि ने आत्म-निर्णय (Self-Enquiry) को आत्म-ज्ञान प्राप्त करने का सर्वोत्तम और सरल तरीका बताया है। आत्म-निर्णय का साधन है "मैं कौन हूँ?" यह प्रश्न व्यक्ति को उसके वास्तविक स्वरूप, यानी आत्मा या परमात्मा से जोड़ता है। इस साधना से व्यक्ति अपने असली स्वरूप को पहचानता है और अहंकार से परे जाता है।

  2. मौन (Silence):

    • श्री रामण महर्षि का मानना था कि मौन एक बहुत शक्तिशाली साधना है। उनका कहना था कि मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं, बल्कि एक आंतरिक शांति और ज्ञान का अनुभव है। मौन के माध्यम से आत्मा का अनुभव अधिक स्पष्ट रूप से होता है, क्योंकि शब्दों और विचारों की चुप्पी से हम अपने भीतर के सत्य को अनुभव कर सकते हैं।

  3. अहंकार और आत्मा:

    • श्री रामण ने अहंकार को आत्मा का मुख्य बंधन माना। वह मानते थे कि जब तक व्यक्ति अपने अहंकार से मुक्त नहीं होता, वह आत्मा के सत्य को नहीं पहचान सकता। आत्म-निर्णय और साधना के द्वारा यह अहंकार समाप्त हो सकता है, और तब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है, जो शुद्ध चैतन्य (Consciousness) है।

  4. सर्वव्यापी प्रेम और करुणा:

    • श्री रामण महर्षि का उपदेश था कि सत्य और आत्मा की प्राप्ति केवल आत्म-ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति को सर्वव्यापी प्रेम और करुणा का अभ्यास भी करना चाहिए। यह प्रेम किसी विशेष व्यक्ति या वस्तु के लिए नहीं है, बल्कि यह ब्रह्म का प्रेम है जो सभी प्राणियों में समान रूप से व्याप्त है।

  5. ईश्वर का अनुभव:

    • श्री रामण महर्षि का मानना था कि ईश्वर और आत्मा का कोई भेद नहीं है। आत्मा और ईश्वर दोनों एक ही अद्वितीय सत्य के रूप हैं। जब हम आत्मा के सत्य को पहचानते हैं, तो हमें परमात्मा का अनुभव भी होता है।

  6. साधना और शांति:

    • श्री रामण महर्षि ने साधना को शांति का साधन बताया। वह मानते थे कि मानसिक शांति और संतुलन के बिना, आत्म-ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है। ध्यान और आत्म-निर्णय के माध्यम से व्यक्ति मानसिक शांति प्राप्त कर सकता है, जो उसे ब्रह्म के सत्य के करीब ले जाता है।

"Revelation – Sri Ramana Hridayam" का संदेश:

यह ग्रंथ हमें यह सिखाता है कि आत्म-ज्ञान प्राप्त करना एक सरल लेकिन गहरी प्रक्रिया है, जो केवल आत्म-निर्णय और साधना से ही संभव है। श्री रामण महर्षि के अनुसार, हर व्यक्ति का उद्देश्य अपने असली स्वरूप को पहचानना और जीवन को सत्य और शांति के मार्ग पर जीना है। उनका यह विश्वास था कि आत्मा के सत्य का अनुभव करने के बाद व्यक्ति को शांति, आनंद और सत्य की प्राप्ति होती है।

Revelation – Sri Ramana Hridayam" एक विशेष और गहन ग्रंथ है जो श्री रामण महर्षि के जीवन, उनके अनुभवों और उनके अद्वितीय आत्म-ज्ञान की शिक्षाओं को प्रस्तुत करता है। यह ग्रंथ श्री मुरुगनार द्वारा लिखा गया था और इसमें श्री रामण महर्षि के दर्शन, उनके विचार, और उनके आध्यात्मिक मार्गदर्शन को संकलित किया गया है। "Sri Ramana Hridayam" का शाब्दिक अर्थ है "श्री रामण के हृदय का ग्रंथ", जिसका मतलब है कि यह ग्रंथ श्री रामण महर्षि के हृदय में गहरे तौर पर बसा हुआ सच्चा ज्ञान और अनुभव है।

"Revelation – Sri Ramana Hridayam" के प्रमुख बिंदु:

  1. आत्म-निर्णय (Self-Enquiry):

    • श्री रामण महर्षि ने आत्म-निर्णय (Self-Enquiry) को आत्म-ज्ञान प्राप्त करने का सर्वोत्तम और सरल तरीका बताया है। आत्म-निर्णय का साधन है "मैं कौन हूँ?" यह प्रश्न व्यक्ति को उसके वास्तविक स्वरूप, यानी आत्मा या परमात्मा से जोड़ता है। इस साधना से व्यक्ति अपने असली स्वरूप को पहचानता है और अहंकार से परे जाता है।

  2. मौन (Silence):

    • श्री रामण महर्षि का मानना था कि मौन एक बहुत शक्तिशाली साधना है। उनका कहना था कि मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं, बल्कि एक आंतरिक शांति और ज्ञान का अनुभव है। मौन के माध्यम से आत्मा का अनुभव अधिक स्पष्ट रूप से होता है, क्योंकि शब्दों और विचारों की चुप्पी से हम अपने भीतर के सत्य को अनुभव कर सकते हैं।

  3. अहंकार और आत्मा:

    • श्री रामण ने अहंकार को आत्मा का मुख्य बंधन माना। वह मानते थे कि जब तक व्यक्ति अपने अहंकार से मुक्त नहीं होता, वह आत्मा के सत्य को नहीं पहचान सकता। आत्म-निर्णय और साधना के द्वारा यह अहंकार समाप्त हो सकता है, और तब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है, जो शुद्ध चैतन्य (Consciousness) है।

  4. सर्वव्यापी प्रेम और करुणा:

    • श्री रामण महर्षि का उपदेश था कि सत्य और आत्मा की प्राप्ति केवल आत्म-ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति को सर्वव्यापी प्रेम और करुणा का अभ्यास भी करना चाहिए। यह प्रेम किसी विशेष व्यक्ति या वस्तु के लिए नहीं है, बल्कि यह ब्रह्म का प्रेम है जो सभी प्राणियों में समान रूप से व्याप्त है।

  5. ईश्वर का अनुभव:

    • श्री रामण महर्षि का मानना था कि ईश्वर और आत्मा का कोई भेद नहीं है। आत्मा और ईश्वर दोनों एक ही अद्वितीय सत्य के रूप हैं। जब हम आत्मा के सत्य को पहचानते हैं, तो हमें परमात्मा का अनुभव भी होता है।

  6. साधना और शांति:

    • श्री रामण महर्षि ने साधना को शांति का साधन बताया। वह मानते थे कि मानसिक शांति और संतुलन के बिना, आत्म-ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है। ध्यान और आत्म-निर्णय के माध्यम से व्यक्ति मानसिक शांति प्राप्त कर सकता है, जो उसे ब्रह्म के सत्य के करीब ले जाता है।

"Revelation – Sri Ramana Hridayam" का संदेश:

यह ग्रंथ हमें यह सिखाता है कि आत्म-ज्ञान प्राप्त करना एक सरल लेकिन गहरी प्रक्रिया है, जो केवल आत्म-निर्णय और साधना से ही संभव है। श्री रामण महर्षि के अनुसार, हर व्यक्ति का उद्देश्य अपने असली स्वरूप को पहचानना और जीवन को सत्य और शांति के मार्ग पर जीना है। उनका यह विश्वास था कि आत्मा के सत्य का अनुभव करने के बाद व्यक्ति को शांति, आनंद और सत्य की प्राप्ति होती है।

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Revelation – Sri Ramana Hridayam" एक विशेष और गहन ग्रंथ है जो श्री रामण महर्षि के जीवन, उनके अनुभवों और उनके अद्वितीय आत्म-ज्ञान की शिक्षाओं को प्रस्तुत करता है। यह ग्रंथ श्री मुरुगनार द्वारा लिखा गया था और इसमें श्री रामण महर्षि के दर्शन, उनके विचार, और उनके आध्यात्मिक मार्गदर्शन को संकलित किया गया है। "Sri Ramana Hridayam" का शाब्दिक अर्थ है "श्री रामण के हृदय का ग्रंथ", जिसका मतलब है कि यह ग्रंथ श्री रामण महर्षि के हृदय में गहरे तौर पर बसा हुआ सच्चा ज्ञान और अनुभव है।

"Revelation – Sri Ramana Hridayam" के प्रमुख बिंदु:

  1. आत्म-निर्णय (Self-Enquiry):

    • श्री रामण महर्षि ने आत्म-निर्णय (Self-Enquiry) को आत्म-ज्ञान प्राप्त करने का सर्वोत्तम और सरल तरीका बताया है। आत्म-निर्णय का साधन है "मैं कौन हूँ?" यह प्रश्न व्यक्ति को उसके वास्तविक स्वरूप, यानी आत्मा या परमात्मा से जोड़ता है। इस साधना से व्यक्ति अपने असली स्वरूप को पहचानता है और अहंकार से परे जाता है।

  2. मौन (Silence):

    • श्री रामण महर्षि का मानना था कि मौन एक बहुत शक्तिशाली साधना है। उनका कहना था कि मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं, बल्कि एक आंतरिक शांति और ज्ञान का अनुभव है। मौन के माध्यम से आत्मा का अनुभव अधिक स्पष्ट रूप से होता है, क्योंकि शब्दों और विचारों की चुप्पी से हम अपने भीतर के सत्य को अनुभव कर सकते हैं।

  3. अहंकार और आत्मा:

    • श्री रामण ने अहंकार को आत्मा का मुख्य बंधन माना। वह मानते थे कि जब तक व्यक्ति अपने अहंकार से मुक्त नहीं होता, वह आत्मा के सत्य को नहीं पहचान सकता। आत्म-निर्णय और साधना के द्वारा यह अहंकार समाप्त हो सकता है, और तब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है, जो शुद्ध चैतन्य (Consciousness) है।

  4. सर्वव्यापी प्रेम और करुणा:

    • श्री रामण महर्षि का उपदेश था कि सत्य और आत्मा की प्राप्ति केवल आत्म-ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति को सर्वव्यापी प्रेम और करुणा का अभ्यास भी करना चाहिए। यह प्रेम किसी विशेष व्यक्ति या वस्तु के लिए नहीं है, बल्कि यह ब्रह्म का प्रेम है जो सभी प्राणियों में समान रूप से व्याप्त है।

  5. ईश्वर का अनुभव:

    • श्री रामण महर्षि का मानना था कि ईश्वर और आत्मा का कोई भेद नहीं है। आत्मा और ईश्वर दोनों एक ही अद्वितीय सत्य के रूप हैं। जब हम आत्मा के सत्य को पहचानते हैं, तो हमें परमात्मा का अनुभव भी होता है।

  6. साधना और शांति:

    • श्री रामण महर्षि ने साधना को शांति का साधन बताया। वह मानते थे कि मानसिक शांति और संतुलन के बिना, आत्म-ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है। ध्यान और आत्म-निर्णय के माध्यम से व्यक्ति मानसिक शांति प्राप्त कर सकता है, जो उसे ब्रह्म के सत्य के करीब ले जाता है।

"Revelation – Sri Ramana Hridayam" का संदेश:

यह ग्रंथ हमें यह सिखाता है कि आत्म-ज्ञान प्राप्त करना एक सरल लेकिन गहरी प्रक्रिया है, जो केवल आत्म-निर्णय और साधना से ही संभव है। श्री रामण महर्षि के अनुसार, हर व्यक्ति का उद्देश्य अपने असली स्वरूप को पहचानना और जीवन को सत्य और शांति के मार्ग पर जीना है। उनका यह विश्वास था कि आत्मा के सत्य का अनुभव करने के बाद व्यक्ति को शांति, आनंद और सत्य की प्राप्ति होती है।