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Shekhar : Ek Jivani (in Two Part) by Agheya (1970-71)

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Shekhar : Ek Jivani (in Two Part) by Agheya (1970-71)

भूमिका

वेदना में एक शक्ति है, जो दृष्टि देती है। जो यातना में है, वह दृष्टा हो सकता है।

'शेखर : एक जीवनी', जो मेरे दस वर्ष के परिश्रम का फल है- दस वर्षों में अभी कुछ देर है, लेकिन 'जीवनी' भी तो अभी पूरी नहीं हुई ! घनीभूत वेदना की केवल एक रात में देखे हुए vision को शब्दबद्ध करने का प्रयत्न है।

आप इसे शेखी समझ सकते हैं। मेरे कहने का यह अभिप्राय नहीं है कि इतना बड़ा पोथा मैने एक रात में गढ़ डाला। नहीं, आप मेरे एक-एक शब्द को फिर ध्यान से पढ़िए- 'शेखर' घनीभूत वेदना की केवल एक रात में देखे हुए vision को शब्दबद्ध करने का प्रयत्न है।

संभव है, आप जानना चाहें, वह रात कैसी थी। किन्तु निजी वातों का वर्णन शक्य नहीं होता, न उसका आपके लिए कोई प्रयोजन ही है। आपके लिए तो उसका यही वर्णन और महत्त्व हो सकता है कि उसमें मैंने यह vision देखा था। वह रात मुझे उपलब्ध कैसे हुई, इसके संबंध में इतना बता सकता हूँ कि जब आधी रात को डाकुओं की तरह आकर पुलिस मुझे बन्दी बना ले गयो, और उसके तत्काल बाद पुलिस के उच्च अधिकारियों से मेरी बातचीत, फिर कहा-सुनी और फिर थोड़ी-सी मारपीट भी हो गई, तब मुझे ऐसा दीखने लगा कि मेरे जीवन की इति शीघ्र होनेवाली है। फाँसी का पात्र मैं अपने को नहीं समझता था, न अब समझता हूँ; लेकिन उस समय की परिस्थिति और अपनी मनःस्थिति के कारण यह मुझे असंभव नहीं लगा। बल्कि मुझे दृढ़ विश्वास हो गया कि यही भवितव्य मेरे सामने है। ऊपर मैंने कहा कि घोर यातना व्यक्ति को दृष्टा बना देती है, यहाँ यह भी कहें कि घोर निराशा उसे अनासक्त बनाकर दृष्टा होने के लिए तैयार करती है। मेरी स्थिति मानो भावानुभावों के घेरे से बाहर निकलकर एक समस्या-रूप में मेरे सामने आयी अगर यही मेरे जीवन का अन्त है, तो उस जीवन का मोल क्या है, अर्थ क्या है, सिद्धि क्या है व्यक्ति के लिए, समाज के लिए, मानव के लिए ?.... इस जिज्ञासा की अनासक्त निर्ममता के, और यातना की सर्वभेदी दृष्टि के आगे मेरा जीवन धीरे-धीरे खुलने लगा, एक निजू और अप्रासंगिक विसंगति के रूप में नहीं, एक घटना के रूप में, एक सामाजिक तथ्य के रूप में; और धीरे-धीरे कार्य-कारण परम्परा के सूत्र सुलझ सुलझकर हाथ में आने लगे........

पौ फटने तक सारा चित्र बदल गया। अर्थ के बहुत से सूत्र मेरे हाथ में थे, लेकिन देह जैसे झर गई थी, धूल हो गई थी। थककर, किन्तु शान्ति पाकर मैं सो गया और दो-तीन दिन तक सोया रहा ।

भूमिका

वेदना में एक शक्ति है, जो दृष्टि देती है। जो यातना में है, वह दृष्टा हो सकता है।

'शेखर : एक जीवनी', जो मेरे दस वर्ष के परिश्रम का फल है- दस वर्षों में अभी कुछ देर है, लेकिन 'जीवनी' भी तो अभी पूरी नहीं हुई ! घनीभूत वेदना की केवल एक रात में देखे हुए vision को शब्दबद्ध करने का प्रयत्न है।

आप इसे शेखी समझ सकते हैं। मेरे कहने का यह अभिप्राय नहीं है कि इतना बड़ा पोथा मैने एक रात में गढ़ डाला। नहीं, आप मेरे एक-एक शब्द को फिर ध्यान से पढ़िए- 'शेखर' घनीभूत वेदना की केवल एक रात में देखे हुए vision को शब्दबद्ध करने का प्रयत्न है।

संभव है, आप जानना चाहें, वह रात कैसी थी। किन्तु निजी वातों का वर्णन शक्य नहीं होता, न उसका आपके लिए कोई प्रयोजन ही है। आपके लिए तो उसका यही वर्णन और महत्त्व हो सकता है कि उसमें मैंने यह vision देखा था। वह रात मुझे उपलब्ध कैसे हुई, इसके संबंध में इतना बता सकता हूँ कि जब आधी रात को डाकुओं की तरह आकर पुलिस मुझे बन्दी बना ले गयो, और उसके तत्काल बाद पुलिस के उच्च अधिकारियों से मेरी बातचीत, फिर कहा-सुनी और फिर थोड़ी-सी मारपीट भी हो गई, तब मुझे ऐसा दीखने लगा कि मेरे जीवन की इति शीघ्र होनेवाली है। फाँसी का पात्र मैं अपने को नहीं समझता था, न अब समझता हूँ; लेकिन उस समय की परिस्थिति और अपनी मनःस्थिति के कारण यह मुझे असंभव नहीं लगा। बल्कि मुझे दृढ़ विश्वास हो गया कि यही भवितव्य मेरे सामने है। ऊपर मैंने कहा कि घोर यातना व्यक्ति को दृष्टा बना देती है, यहाँ यह भी कहें कि घोर निराशा उसे अनासक्त बनाकर दृष्टा होने के लिए तैयार करती है। मेरी स्थिति मानो भावानुभावों के घेरे से बाहर निकलकर एक समस्या-रूप में मेरे सामने आयी अगर यही मेरे जीवन का अन्त है, तो उस जीवन का मोल क्या है, अर्थ क्या है, सिद्धि क्या है व्यक्ति के लिए, समाज के लिए, मानव के लिए ?.... इस जिज्ञासा की अनासक्त निर्ममता के, और यातना की सर्वभेदी दृष्टि के आगे मेरा जीवन धीरे-धीरे खुलने लगा, एक निजू और अप्रासंगिक विसंगति के रूप में नहीं, एक घटना के रूप में, एक सामाजिक तथ्य के रूप में; और धीरे-धीरे कार्य-कारण परम्परा के सूत्र सुलझ सुलझकर हाथ में आने लगे........

पौ फटने तक सारा चित्र बदल गया। अर्थ के बहुत से सूत्र मेरे हाथ में थे, लेकिन देह जैसे झर गई थी, धूल हो गई थी। थककर, किन्तु शान्ति पाकर मैं सो गया और दो-तीन दिन तक सोया रहा ।

$8.51
Shekhar : Ek Jivani (in Two Part) by Agheya (1970-71)
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Description

भूमिका

वेदना में एक शक्ति है, जो दृष्टि देती है। जो यातना में है, वह दृष्टा हो सकता है।

'शेखर : एक जीवनी', जो मेरे दस वर्ष के परिश्रम का फल है- दस वर्षों में अभी कुछ देर है, लेकिन 'जीवनी' भी तो अभी पूरी नहीं हुई ! घनीभूत वेदना की केवल एक रात में देखे हुए vision को शब्दबद्ध करने का प्रयत्न है।

आप इसे शेखी समझ सकते हैं। मेरे कहने का यह अभिप्राय नहीं है कि इतना बड़ा पोथा मैने एक रात में गढ़ डाला। नहीं, आप मेरे एक-एक शब्द को फिर ध्यान से पढ़िए- 'शेखर' घनीभूत वेदना की केवल एक रात में देखे हुए vision को शब्दबद्ध करने का प्रयत्न है।

संभव है, आप जानना चाहें, वह रात कैसी थी। किन्तु निजी वातों का वर्णन शक्य नहीं होता, न उसका आपके लिए कोई प्रयोजन ही है। आपके लिए तो उसका यही वर्णन और महत्त्व हो सकता है कि उसमें मैंने यह vision देखा था। वह रात मुझे उपलब्ध कैसे हुई, इसके संबंध में इतना बता सकता हूँ कि जब आधी रात को डाकुओं की तरह आकर पुलिस मुझे बन्दी बना ले गयो, और उसके तत्काल बाद पुलिस के उच्च अधिकारियों से मेरी बातचीत, फिर कहा-सुनी और फिर थोड़ी-सी मारपीट भी हो गई, तब मुझे ऐसा दीखने लगा कि मेरे जीवन की इति शीघ्र होनेवाली है। फाँसी का पात्र मैं अपने को नहीं समझता था, न अब समझता हूँ; लेकिन उस समय की परिस्थिति और अपनी मनःस्थिति के कारण यह मुझे असंभव नहीं लगा। बल्कि मुझे दृढ़ विश्वास हो गया कि यही भवितव्य मेरे सामने है। ऊपर मैंने कहा कि घोर यातना व्यक्ति को दृष्टा बना देती है, यहाँ यह भी कहें कि घोर निराशा उसे अनासक्त बनाकर दृष्टा होने के लिए तैयार करती है। मेरी स्थिति मानो भावानुभावों के घेरे से बाहर निकलकर एक समस्या-रूप में मेरे सामने आयी अगर यही मेरे जीवन का अन्त है, तो उस जीवन का मोल क्या है, अर्थ क्या है, सिद्धि क्या है व्यक्ति के लिए, समाज के लिए, मानव के लिए ?.... इस जिज्ञासा की अनासक्त निर्ममता के, और यातना की सर्वभेदी दृष्टि के आगे मेरा जीवन धीरे-धीरे खुलने लगा, एक निजू और अप्रासंगिक विसंगति के रूप में नहीं, एक घटना के रूप में, एक सामाजिक तथ्य के रूप में; और धीरे-धीरे कार्य-कारण परम्परा के सूत्र सुलझ सुलझकर हाथ में आने लगे........

पौ फटने तक सारा चित्र बदल गया। अर्थ के बहुत से सूत्र मेरे हाथ में थे, लेकिन देह जैसे झर गई थी, धूल हो गई थी। थककर, किन्तु शान्ति पाकर मैं सो गया और दो-तीन दिन तक सोया रहा ।

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