
संस्कृत परिवेश और मध्य प्रदेश- Sanskrit Parivesh aur Madhya Pradesh
भारत के केंन्द्र म. प्र. में इस महान् राष्ट्र का हृदय स्पन्दित है। यहाँ की हरी-भरी धरती संस्कृत साहित्यकारों का नन्दन वन है। महर्षि अत्रि, वाल्मीकि, भास, पतञ्जलि और कालिदास से लेकर बाणभट्ट, भवभूति, राजशेखर और भोज की गौरवशालिनी परम्परा में आज भी देवभाषा के अनेक शब्दकार इस प्रदेश में साहित्य-साधना कर रहे हैं।
ऐतिहासिक काल-विभाजन के अनुसार समूचे देश की बहुविध संस्कृत-चेतना सहेजते हुए छत्तीसगढ़ के साथ मध्यप्रदेश का यह अद्यतन साहित्यिक आकलन है।
भारत के केंन्द्र म. प्र. में इस महान् राष्ट्र का हृदय स्पन्दित है। यहाँ की हरी-भरी धरती संस्कृत साहित्यकारों का नन्दन वन है। महर्षि अत्रि, वाल्मीकि, भास, पतञ्जलि और कालिदास से लेकर बाणभट्ट, भवभूति, राजशेखर और भोज की गौरवशालिनी परम्परा में आज भी देवभाषा के अनेक शब्दकार इस प्रदेश में साहित्य-साधना कर रहे हैं।
ऐतिहासिक काल-विभाजन के अनुसार समूचे देश की बहुविध संस्कृत-चेतना सहेजते हुए छत्तीसगढ़ के साथ मध्यप्रदेश का यह अद्यतन साहित्यिक आकलन है।
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भारत के केंन्द्र म. प्र. में इस महान् राष्ट्र का हृदय स्पन्दित है। यहाँ की हरी-भरी धरती संस्कृत साहित्यकारों का नन्दन वन है। महर्षि अत्रि, वाल्मीकि, भास, पतञ्जलि और कालिदास से लेकर बाणभट्ट, भवभूति, राजशेखर और भोज की गौरवशालिनी परम्परा में आज भी देवभाषा के अनेक शब्दकार इस प्रदेश में साहित्य-साधना कर रहे हैं।
ऐतिहासिक काल-विभाजन के अनुसार समूचे देश की बहुविध संस्कृत-चेतना सहेजते हुए छत्तीसगढ़ के साथ मध्यप्रदेश का यह अद्यतन साहित्यिक आकलन है।














