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सत्संग-Satsang (Second Part) (1993)

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सत्संग-Satsang (Second Part) (1993)

स्वामी निरंजनानन्द सरस्वती

स्वामी निरंजनानन्द सरस्वती का जन्म सन् १९६० में हुआ । २६ जुलाई १९६४ को वे बिहार योग विद्यालय में आये तथा संन्यास ग्रहण कर गुरु के योग-प्रचार-अभियान में शामिल हुए। यहीं उनकी गुरुकुल शिक्षा प्रारम्भ हुई ।

१ मार्च १९७० को उन्हें विदेश भेजा गया। उन्हें आयरलैण्ड, इंग्लैण्ड एवं अन्य यूरोपीय देशों में योगाश्रमों तथा योग-केन्द्रों की स्थापना तथा विकास का कार्य सौंपा गया। आगामी तेरह वर्षों में उन्होंने उत्तर और दक्षिण अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया सहित सारे विश्व की यात्रा की। इस यात्रा के क्रम में वे योग कार्यक्रमों का संचालन तथा विभिन्न संस्कृतियों का अध्ययन करते रहे ।

१९ जनवरी १९८३ को वे भारत वापस बुलाये गये तथा अपने गुरु स्वामी सत्यानन्द सरस्वती द्वारा बिहार योग विद्यालय के अध्यक्ष नियुक्त किये गये। उस समय से वे बिहार योग विद्यालय तथा सन् १९८४ में स्थापित दो नई संस्थाओं-शिवानन्द मठ एवं योग शोध संस्स्थान-का संचालन कुशलतापूर्वक कर रहे हैं।

स्वामी निरंजन जी अपने गुरु के सुयोग्य उत्तराधिकारी हैं। विश्व के विभिन्न भागों में रहने वाले हजारों योग साधक उनका सम्मान एक महान योगी तथा प्रबुद्ध आध्यात्मिक गुरु के रूप में करते हैं। चार वर्ष की छोटी उम्र में ही अपने गुरु स्वामी सत्यानन्द जी की छत्रछाया में उनका आध्यात्मिक प्रशिक्षण प्रारम्भ हुआ और उनतीस वर्ष की अवस्था में, ३१ दिसम्बर १९८९ की मध्य रात्रि में उनके गुरु ने उन्हें 'परमहंस' की दीक्षा से विभूषित किया ।

गहन आध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ स्वामी निरंजन जी में बालसुलभ सरलता एवं मधुर विनोदशीलता है। इन गुणों के कारण वे अपने सम्पर्क में आनेवाले सभी लोगों का मन और हृदय जीत लेते हैं।

स्वामी निरंजनानन्द सरस्वती

स्वामी निरंजनानन्द सरस्वती का जन्म सन् १९६० में हुआ । २६ जुलाई १९६४ को वे बिहार योग विद्यालय में आये तथा संन्यास ग्रहण कर गुरु के योग-प्रचार-अभियान में शामिल हुए। यहीं उनकी गुरुकुल शिक्षा प्रारम्भ हुई ।

१ मार्च १९७० को उन्हें विदेश भेजा गया। उन्हें आयरलैण्ड, इंग्लैण्ड एवं अन्य यूरोपीय देशों में योगाश्रमों तथा योग-केन्द्रों की स्थापना तथा विकास का कार्य सौंपा गया। आगामी तेरह वर्षों में उन्होंने उत्तर और दक्षिण अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया सहित सारे विश्व की यात्रा की। इस यात्रा के क्रम में वे योग कार्यक्रमों का संचालन तथा विभिन्न संस्कृतियों का अध्ययन करते रहे ।

१९ जनवरी १९८३ को वे भारत वापस बुलाये गये तथा अपने गुरु स्वामी सत्यानन्द सरस्वती द्वारा बिहार योग विद्यालय के अध्यक्ष नियुक्त किये गये। उस समय से वे बिहार योग विद्यालय तथा सन् १९८४ में स्थापित दो नई संस्थाओं-शिवानन्द मठ एवं योग शोध संस्स्थान-का संचालन कुशलतापूर्वक कर रहे हैं।

स्वामी निरंजन जी अपने गुरु के सुयोग्य उत्तराधिकारी हैं। विश्व के विभिन्न भागों में रहने वाले हजारों योग साधक उनका सम्मान एक महान योगी तथा प्रबुद्ध आध्यात्मिक गुरु के रूप में करते हैं। चार वर्ष की छोटी उम्र में ही अपने गुरु स्वामी सत्यानन्द जी की छत्रछाया में उनका आध्यात्मिक प्रशिक्षण प्रारम्भ हुआ और उनतीस वर्ष की अवस्था में, ३१ दिसम्बर १९८९ की मध्य रात्रि में उनके गुरु ने उन्हें 'परमहंस' की दीक्षा से विभूषित किया ।

गहन आध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ स्वामी निरंजन जी में बालसुलभ सरलता एवं मधुर विनोदशीलता है। इन गुणों के कारण वे अपने सम्पर्क में आनेवाले सभी लोगों का मन और हृदय जीत लेते हैं।

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सत्संग-Satsang (Second Part) (1993)
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Description

स्वामी निरंजनानन्द सरस्वती

स्वामी निरंजनानन्द सरस्वती का जन्म सन् १९६० में हुआ । २६ जुलाई १९६४ को वे बिहार योग विद्यालय में आये तथा संन्यास ग्रहण कर गुरु के योग-प्रचार-अभियान में शामिल हुए। यहीं उनकी गुरुकुल शिक्षा प्रारम्भ हुई ।

१ मार्च १९७० को उन्हें विदेश भेजा गया। उन्हें आयरलैण्ड, इंग्लैण्ड एवं अन्य यूरोपीय देशों में योगाश्रमों तथा योग-केन्द्रों की स्थापना तथा विकास का कार्य सौंपा गया। आगामी तेरह वर्षों में उन्होंने उत्तर और दक्षिण अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया सहित सारे विश्व की यात्रा की। इस यात्रा के क्रम में वे योग कार्यक्रमों का संचालन तथा विभिन्न संस्कृतियों का अध्ययन करते रहे ।

१९ जनवरी १९८३ को वे भारत वापस बुलाये गये तथा अपने गुरु स्वामी सत्यानन्द सरस्वती द्वारा बिहार योग विद्यालय के अध्यक्ष नियुक्त किये गये। उस समय से वे बिहार योग विद्यालय तथा सन् १९८४ में स्थापित दो नई संस्थाओं-शिवानन्द मठ एवं योग शोध संस्स्थान-का संचालन कुशलतापूर्वक कर रहे हैं।

स्वामी निरंजन जी अपने गुरु के सुयोग्य उत्तराधिकारी हैं। विश्व के विभिन्न भागों में रहने वाले हजारों योग साधक उनका सम्मान एक महान योगी तथा प्रबुद्ध आध्यात्मिक गुरु के रूप में करते हैं। चार वर्ष की छोटी उम्र में ही अपने गुरु स्वामी सत्यानन्द जी की छत्रछाया में उनका आध्यात्मिक प्रशिक्षण प्रारम्भ हुआ और उनतीस वर्ष की अवस्था में, ३१ दिसम्बर १९८९ की मध्य रात्रि में उनके गुरु ने उन्हें 'परमहंस' की दीक्षा से विभूषित किया ।

गहन आध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ स्वामी निरंजन जी में बालसुलभ सरलता एवं मधुर विनोदशीलता है। इन गुणों के कारण वे अपने सम्पर्क में आनेवाले सभी लोगों का मन और हृदय जीत लेते हैं।