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सत्ववजय-Sattvavajay (2000)

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सत्ववजय-Sattvavajay (2000)

चिन्तन

इस लौकिक जगत् में सब कुछ नश्वर है। जो प्रत्यक्ष है, वह नाशवान है। फिर परोक्ष क्या है? कैसा है? क्यों है? पुनरऽपि जन्मम्, पुनरऽपि मरणम् के आवागमन का कारण क्या है? स्वयं का अस्तित्व क्या है। चिन्तन का विषय वर्तमान, भूत एवं भविष्यत् की स्थितियां व संभावनाएं है। संसार में दुःख और सुख दोनों हैं। भोग्या वसुन्धरा का भोग सीमा क्या है? भोग समाप्त हो जाता है, वसुन्धरा पड़ी रहती है। और 'पुनरपि मरणं, पुनरपि जन्मम्' लगा रहता है। यह स्मृति कैसे उत्पन्न होती है?

इस स्मृति के आठ कारण हैं- (१) निमित्त (कारण) के ग्रहण करने से (२) रूप वा लिङ्ग के देखने से (३) सादृश्य (समानता) से (४) विभिन्नता से (५) मन के अनुबन्ध से (६) अभ्यास से (७) ज्ञान योग से (८) दुबारा सुनने से।

कर्म से ही धर्माधर्म होते हैं। उपधा ही निश्वय से दुःख और दुःख के आश्रय शरीर को देने वाला मूल कारण है। बारम्बार संसार के बनधन में पड़ना ही दुःख है। दुःख का आश्रय शरीर है। उपधा का त्याग सब दुःखों का नाशक है।

उपधा कहते हैं भाव दोष को। प्रवृत्ति लक्षण को भाव दोष कहते हैं। वैशेषिक दर्शन में कहा गया है-"भावदोष उपधाऽदोषोऽनुपधा।" जिस दोष के कारण पुरुष संसार में बंधा रहता है, ये दोष तीन हैं-राग, द्वेष और मोह।" पुरुषों राशि संज्ञस्तु मोहेच्छा द्वेष कर्मजः।" १-धर्म २-अधर्म ३-ज्ञान ४-अज्ञान ५-वैराग्य ६-अवैराग्य ७ ऐश्वर्य ८- अनैश्वर्य, ये आठ भाव हैं। इसमें ज्ञान को छोड़ कर शेष सात भाव को उपधा कहते हैं। राग, द्वेष, मोह से रहित होने पर समस्त दुःख नष्ट हो जाते हैं। पुरुष बन्धन में नहीं आता है, क्योंकि जब प्रवृत्ति का हेतु नहीं तो कार्य कैसे हो सकता है? जैसे रेशम का कीड़ा अपने ही मृत्यु के कारण भूत रेशों को स्वयं उत्पन्न करता है, वैसे ही ज्ञान रहित पुरुष विषयों की तृष्णा को उत्पन्न कर लेता है। अर्थात् विषयों को देखकर उनके उपभोग की लालसा होती है। जितना उपभोग करता है, उतना ही उसमें फँसा रहता है। जो ज्ञानी विषयों को अग्नि के सदृश जानकर उनसे निवृत्ति हो जाते हैं, कर्मों के न

सत्त्वावजय / ०९

चिन्तन

इस लौकिक जगत् में सब कुछ नश्वर है। जो प्रत्यक्ष है, वह नाशवान है। फिर परोक्ष क्या है? कैसा है? क्यों है? पुनरऽपि जन्मम्, पुनरऽपि मरणम् के आवागमन का कारण क्या है? स्वयं का अस्तित्व क्या है। चिन्तन का विषय वर्तमान, भूत एवं भविष्यत् की स्थितियां व संभावनाएं है। संसार में दुःख और सुख दोनों हैं। भोग्या वसुन्धरा का भोग सीमा क्या है? भोग समाप्त हो जाता है, वसुन्धरा पड़ी रहती है। और 'पुनरपि मरणं, पुनरपि जन्मम्' लगा रहता है। यह स्मृति कैसे उत्पन्न होती है?

इस स्मृति के आठ कारण हैं- (१) निमित्त (कारण) के ग्रहण करने से (२) रूप वा लिङ्ग के देखने से (३) सादृश्य (समानता) से (४) विभिन्नता से (५) मन के अनुबन्ध से (६) अभ्यास से (७) ज्ञान योग से (८) दुबारा सुनने से।

कर्म से ही धर्माधर्म होते हैं। उपधा ही निश्वय से दुःख और दुःख के आश्रय शरीर को देने वाला मूल कारण है। बारम्बार संसार के बनधन में पड़ना ही दुःख है। दुःख का आश्रय शरीर है। उपधा का त्याग सब दुःखों का नाशक है।

उपधा कहते हैं भाव दोष को। प्रवृत्ति लक्षण को भाव दोष कहते हैं। वैशेषिक दर्शन में कहा गया है-"भावदोष उपधाऽदोषोऽनुपधा।" जिस दोष के कारण पुरुष संसार में बंधा रहता है, ये दोष तीन हैं-राग, द्वेष और मोह।" पुरुषों राशि संज्ञस्तु मोहेच्छा द्वेष कर्मजः।" १-धर्म २-अधर्म ३-ज्ञान ४-अज्ञान ५-वैराग्य ६-अवैराग्य ७ ऐश्वर्य ८- अनैश्वर्य, ये आठ भाव हैं। इसमें ज्ञान को छोड़ कर शेष सात भाव को उपधा कहते हैं। राग, द्वेष, मोह से रहित होने पर समस्त दुःख नष्ट हो जाते हैं। पुरुष बन्धन में नहीं आता है, क्योंकि जब प्रवृत्ति का हेतु नहीं तो कार्य कैसे हो सकता है? जैसे रेशम का कीड़ा अपने ही मृत्यु के कारण भूत रेशों को स्वयं उत्पन्न करता है, वैसे ही ज्ञान रहित पुरुष विषयों की तृष्णा को उत्पन्न कर लेता है। अर्थात् विषयों को देखकर उनके उपभोग की लालसा होती है। जितना उपभोग करता है, उतना ही उसमें फँसा रहता है। जो ज्ञानी विषयों को अग्नि के सदृश जानकर उनसे निवृत्ति हो जाते हैं, कर्मों के न

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इस लौकिक जगत् में सब कुछ नश्वर है। जो प्रत्यक्ष है, वह नाशवान है। फिर परोक्ष क्या है? कैसा है? क्यों है? पुनरऽपि जन्मम्, पुनरऽपि मरणम् के आवागमन का कारण क्या है? स्वयं का अस्तित्व क्या है। चिन्तन का विषय वर्तमान, भूत एवं भविष्यत् की स्थितियां व संभावनाएं है। संसार में दुःख और सुख दोनों हैं। भोग्या वसुन्धरा का भोग सीमा क्या है? भोग समाप्त हो जाता है, वसुन्धरा पड़ी रहती है। और 'पुनरपि मरणं, पुनरपि जन्मम्' लगा रहता है। यह स्मृति कैसे उत्पन्न होती है?

इस स्मृति के आठ कारण हैं- (१) निमित्त (कारण) के ग्रहण करने से (२) रूप वा लिङ्ग के देखने से (३) सादृश्य (समानता) से (४) विभिन्नता से (५) मन के अनुबन्ध से (६) अभ्यास से (७) ज्ञान योग से (८) दुबारा सुनने से।

कर्म से ही धर्माधर्म होते हैं। उपधा ही निश्वय से दुःख और दुःख के आश्रय शरीर को देने वाला मूल कारण है। बारम्बार संसार के बनधन में पड़ना ही दुःख है। दुःख का आश्रय शरीर है। उपधा का त्याग सब दुःखों का नाशक है।

उपधा कहते हैं भाव दोष को। प्रवृत्ति लक्षण को भाव दोष कहते हैं। वैशेषिक दर्शन में कहा गया है-"भावदोष उपधाऽदोषोऽनुपधा।" जिस दोष के कारण पुरुष संसार में बंधा रहता है, ये दोष तीन हैं-राग, द्वेष और मोह।" पुरुषों राशि संज्ञस्तु मोहेच्छा द्वेष कर्मजः।" १-धर्म २-अधर्म ३-ज्ञान ४-अज्ञान ५-वैराग्य ६-अवैराग्य ७ ऐश्वर्य ८- अनैश्वर्य, ये आठ भाव हैं। इसमें ज्ञान को छोड़ कर शेष सात भाव को उपधा कहते हैं। राग, द्वेष, मोह से रहित होने पर समस्त दुःख नष्ट हो जाते हैं। पुरुष बन्धन में नहीं आता है, क्योंकि जब प्रवृत्ति का हेतु नहीं तो कार्य कैसे हो सकता है? जैसे रेशम का कीड़ा अपने ही मृत्यु के कारण भूत रेशों को स्वयं उत्पन्न करता है, वैसे ही ज्ञान रहित पुरुष विषयों की तृष्णा को उत्पन्न कर लेता है। अर्थात् विषयों को देखकर उनके उपभोग की लालसा होती है। जितना उपभोग करता है, उतना ही उसमें फँसा रहता है। जो ज्ञानी विषयों को अग्नि के सदृश जानकर उनसे निवृत्ति हो जाते हैं, कर्मों के न

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